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इस चलती फिरती दुनियाँ में हम कहाँ ?

डा० जी० भक्त

ब्रह्माण्ड की रचना और सृष्टि की चेतना में त्रिगुण का विस्तार जब माया का जाल रच डाला तो इन्द्रियों की भूख में वासना ने प्रकृति से हमें जोड़ने का काम किया। यही से हमारी यात्रा की शुरूआत हुयी। कर्मों से जुड़ कर हम बंध गये।

अब हमारी आयु का निर्धारण पंचतत्त्व का खेल बना या कर्मों का बन्धन अपनी माया में लिप्त होने से हुआ सुखों का भोग और माय का मोह किंचित कष्टों की अनुभूति से दो चार हुआ यहीं से जीवन में संघर्ष की ज्वाला पैदा हुयी जिसमें प्रवृत्तियों का प्रस्फुटन अपनी अपनी दिशा में इन्द्रियों को प्रभावित कर डाला जो आत्मा (दही) को मुक्ति पर विचारने को बाध्य किया।

यही मुक्ति की भावना जीवन को संरक्षण देने हेतु चिन्तन का मार्ग प्रस्फुटित हुआ। ज्ञान का प्रकाश फैला। तब हम जीव की श्रेणी से ऊपर उठना प्रारंभ किये आज हम मानव तो बने किन्तु हमारी प्रवृत्ति कदाचित वाधक बनकर हमें दानव की दिशा में डाल रखा। आज हम मुक्ति, शान्ति सद्गति की खोज में भटक रहे हैं। सद गुरु की तलाश है। भविष्य पर कहरा छाया है।

ज्ञान का प्रकाश चाहिए । किन्तु ? पहले प्रदूषण को तो हटायें।

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