Wed. Feb 1st, 2023

 कमाल के साबित हो रहे कोरोना जंग के काफिले

 डा ० जी ० भक्त

 इसे दुर्भाग्य कहे मानव का या कमजोर भूमिका विकसित व्यवस्था की , जब , समाज में भय , आतंक , अविश्वास , मृत्यु , संकट , बेरोजगारो दोहन , महँगाई और चिकित्सा तथा संसाधन के अभाव के साथ कोरोना का नाटकीय संक्रमण एक भल भहैया बन रहा । इस विश्व व्यापी महामारी ने तो मानव को ही नहीं मारा , वरन मानवता को ही मिटा डाला । जब मरने वाले के प्रति संवदना होती थी , उसकी संस्कृति को ही मिटा डाली । एक अमानवीय जीवन शैली अनिश्कितता की स्थिति में मुजर रहे जीवन पर कष्ट , भय , चिन्ता , बेकारी , महँगाई , स्नेह सद्भाव अभाव और अनीति का अजूबा खेल चल रहा है ।

 तरह – तरह की भ्रातियाँ जन मानस को यथार्त कर रही । यहाँ तक बात आ गयी कि विश्व की जनसंख्या घटाने की यह उच्चस्तरीय कूटनीति चल रही है । मरने की बात नहीं महत्वाकांक्षा की लड़ाई लड़ने वाले ही कोरोना के योद्धा हैं । यह विश्व के लिए जो भ्रान्तिमान है वह शक्तिमान के रुप में दिख रहा , अगर ऐसी परिस्थिति रही तो मानव अपनी मानवता पर पड़ते प्रहार से विनाश की दिशा पकड़ लेगा ।

 आज जो भारत में देखा जा रहा है , उसमें एक कहावत सटीक बैठती है कि मरने अर्थात मृत्यु की श्रृंखला बधने का भय है । …. क्योंकि कहीं नही रहा उससे समाज पर पड़ने वाले प्रभाव और मानवीय व्यवहारो मे विचलन शोषण दोहण , महँगाई , बेकारी सब की मार पड़ने लगी ।

 एक और गम्भीर और विचारणीय प्रश्न है संक्रमण के बचाव के जो हिदायत अपनाये जा रहे है उस पर कड़ाई , जुमाना , भय तो है ही , दवा , वैक्सीन , उसकी कभी , चिकित्सा का अभाव बदलते खेल व्यवस्थागत कमिया , स्वास्थ्य विभाग की पूरी निश्क्रियता भी मानी जा सकती है क्योंकि वह इस कोरोना के प्रति किसी सुनिश्चित सुलझ घरातल पर खड़ी नजर नही आ रही , तो सरकार की सक्रियता को आप किस नजर से ऑक सकेंगे ?

 हम अपनी सरकार को बेखबर पा रहे है लेकिन कमियों पर भी जनता तक खबरें ( क्या गलत क्या सही ) जो पहुँचती है वही जनता जान पाती है तो चिन्ता और भय स्वाभाविक है । विभागीय निश्क्रियता इसलिए कही जा सकती है कि यह राजनीतिक विषय नही चिकित्सा का विषय है उसमें विश्व की चिकित्सा व्यवस्था ( एलोपैथी ) स्वतः अपने को कमजोर घोषित कर दुनियाँ को भयाक्रान्त कर डाली जो आज विश्वास खोकर घबड़ा रही है । दिन प्रतिदिन के बढ़ते संक्रमण और मरने के आँकड़े उसे चिन्तित कर रह ह तो घोषणाओं पर जीना कब तक चल पायेगा ।

 आज देश के हितैषी विचारक कुछ सोचते – लिखते समाचारों में आते हैं , सरकार कहती है कि मैं इसके लिए सर्वदलीय बैठक में निर्णय ले रहा हूँ । यही सब कुछ है । उनके विघायक संसद ही क्या रोग भगायेंगे कि उनके चिकित्सा विभाग को आगे आना होगा । क्या करना होगा इस संग्राम को जीतने में वह संसद और एलोपैथी की परम जिम्मेदारी में आती है ।

Coronavirus Corona vaccine

 दवा नहो , वैक्सीन यथेष्ट नहीं , उस पर भी विवाद कोरोना पर स्थिर शोध नही उल्टा – सीधा संवाद – परिवाद , जाँच में कभी अस्पताल की कभी , ऑक्सीजन की कमी और चुनाव कराना सरकार के लिए अति जरुरी , पढ़ाई बन्द तो जीवन रक्षक चिकित्सक कहा पैदा लेंगे । क्या उसे हम रोग नही कहेंगे ।

 न ययेष्ट साधन न पर्याप्त व्यवस्था जनता में कफ्यू और चुनाव में सरगर्नी , चिन्ता तो जताऐगी ।

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