Sat. Feb 4th, 2023

 कोरोना का कहर दिखाया कुछ असर

 विपत्तियाँ मानव जाति पर चुनौतियाँ लाती है किंतु वह समाधान भी सिखाती है | गोस्वामी जी , जिन्हें हम संत कवि तुलसी दास के नाम से जानते हैं , उन्होंने अपनी रामायण रामचरित मानस में अभिव्यक्त किया-
 धीरज धर्म मित्र आरू नारी |
 आपत काल परखिए चारी ||
 यह सत्यस : प्रतिति पा चुकी है | आज इसकी याद हमें रोमांचित कर रही जब इस कोरोना के जंग में विकसित विश्व को कोई दवा न सूझ पाई तो भारत इससे कभी पीछे पड़ने वाला नहीं , उसे अपनी संस्कृति का आयुर्वेदिक नुस्खा ही सहायक लगा | योग , दिनचर्या का नियमित पालन , भीड़ से बचना , स्वच्छता , शांति के वातावरण , भक्ति , सुचिंतन , धर्माचरण , ग्रंथों का अध्ययन , पूजा – पाठ , साधना , भजन जाप , स्वाध्याय , उपवास , मौन साधन , तथा घर बैठे मनोरंजन का लाभ , सभोजन , आराम और निश्चिंत शयन का आनंद लेना जो आज संभव हुआ , यह स्योग कोरोना के कारण हीं मिल पाया |
 विडंबना है की हम भारतीयों को योग , जप , यग्य व्रत , पूजा , पाठ अनुष्ठान आदि के लिए सोचना पड़ता है | सार्वजनिक तौर पर यह हो नहीं पाता | हर व्यक्ति इसमें भाग नहीं लेता , शांति के बदले कोलाहलपूर्ण वातावरण में संपन्न होता है | भीड़ लगती है ।
 कोरोना वाइरस का संक्रमण जब विश्व के अधिकांश विकसित देशों को अपना ग्रास बना चुका था , वैश्विक विपदा बनकर छा चुका था , तब भारत में इसका असर प्रवासियों के पलायन वस अपने – देश में लौटने पर देखा गया | जब दुनियावाले इसकी निवारणात्मक कार्रवाई के प्रति अपना दिवालियापन दिखा चुके थे तो भास को अपनी संस्कृति पर भरोसा करना ही पड़ा । इसके कई अन्य फायदे भी देखने को मिल रहे | यथा :-
 ( क ) देश के युवावर्ग अपनी भारतीय संस्कृति की पहचान मिली | उसके महत्त्व और प्रासंगिकता दोनों ही को अपनी नज़रों से देखा समझा |
 ( ख ) आयुर्वेद , योग , प्राकृतिक चिकित्सा , आहार संयम , सात्त्विकता और निरामिष भोजन को महत्त्व देना आज के सन्दर्भ में सहायक सिद्ध हुआ |
 ( ग ) एकता , सहयोग , समर्थन , धैर्य , अनुशासन , प्रकृति से प्रीति और एकात्म भाव रखना जीवन का मूल मंत्र के रूप में स्वीकारा |
 ( घ ) संकट की घड़ी में आत्म संयम को प्राथमिकता देना मानव का प्रथम कर्तव्य बना ।
 ( ड . ) नियम पालन करने का व्यवहारिक प्रशिक्षण जीवन रक्षा का साधन साबित हुआ |
 कोरोना विश्व के इतिहास में सबसे बड़ा संकट साबित हुआ , क्योंकि:-
 * यह लगभग पूरे विश्व को अपनी चपेट में लिया |
 * जब दुनिया वालों ने इसके प्रति निदान का मार्ग अबतक नहीं निकाला |
 * इसका प्रभाव श्वसन तंत्र पर ही पड़ा , जिसके कारण यह घातक साबित हुआ |
 * इसकी प्रवृत्ति , प्रकृति प्रकृति , विकास , पोषिता , जीवन चक्र , आयु ग्रोथ , प्रभाव काल , फेज , प्राथमिक , लक्षण , टर्मिनेशन , डाइयग्नॉस्टिक फीचर , कम्प्लिकेसन , प्रोग्नोसिस पोस्ट मार्टम साइन आदि पर अबतक पुष्ट जानकारी की कमी पाई गयी ।
 * यह प्रत्यक्षत : मान्य है की भारत में इसके बचाव के तरीके अपनाए गये , उससे संक्रमण की गति नियंत्रित रही ।
 * विश्व के एपिडेमोलॉजिस्ट एवम् वायरोलॉजिस्ट इसपर मंथन करें और प्रभावी कदम की पहल हो |
 * होमेयोपैथी द्वारा रेस्पिरेटरी डिसीज़ , सिंड्रोम पर अब तक की परीक्षित एवम् प्रयुक्त दवाओं का कोरोना पर परीक्षण लक्षण समष्टि के आधार पर की जाय तथा इसका नोसोड तैयार कर या रोज़ी के एक्सक्रेय का आयसॉपैथिक परीक्षण किया जाय |
 हिप्पोजेनियम , म्यूको कॉक्सिन कैटरैलिस तथा माइक्रो कोक्कस टेट्रजेनी यस का प्रयोग बहुमूल्य कार्य करता है | नोसोड दवा होने से यह सब अत्यंत प्रभावी प्रिवेंटिव एवम् क्योरेटिव दोनों ही काम में आता है । इसकी चर्चा 23-24 एप्रिल 1982 को स्टेट होमेयोपैथिक कांफ्रेंस एवम् सेमिनार धनबाद में ” डिसीज़स ऑफ अपर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट ” नामक विषय पर भारत के ( H. M. A. I. ) के जाने माने होमेयोपैथ डा . जे . एन . कांजीलाल डा . एस . वी . सिन्हा , डा . वी . एन . मिश्रा , डा . अनिल भाटिया , डा . जी . एन . मुखर्जी , आदि होमेयोपैथ चिकित्सकों ने अपना बहुमूल्य विचार व्यक्त किया था |
  अभी – अभी टी . वी . पर समाचार आया है की आयुष की ओर से आगरा के किसी होमेयोपैथिक कॉलेज को सलाह दी गयी है की वहाँ के चिकित्सकगण कोरोना पर होमेयोपैथिक दवा का प्रयोग करें | वही पर आर्सेनिक एल्ब के प्रयोग की चर्चा हुई तथा ब्रयोनिया , जेलसिनियम एंटिम टार्ट एवम् एंति आर्स के प्रयोग पर चर्चा उठी | पहले तो इन दवाओं पर विशेष विमर्श की ज़रूरत है । आर्सेनिक एल्ब , ई ० , जेल्स और ब्रयोनिया के संबंध में क्लिनिकल फीचर पर ध्यान देते हुए उसके थेराप्युटिक मूल्यों का निर्देशन ज़रूरी होगा | आर्सेनिक एक्यूट इन्क्सोम ट्री फीचर की दशा में जीवनी शक्ति कमजोर करने वाली दवा है | इसपर डा . केंट के विचार पर ध्यान देना होगा | यह दवा उस अवस्था में महत्वपूर्ण होती है जब उसके कैडाबेरीक सिंड्रोम वर्तमान हो | कोरोना के लिए नोसोड दवा का प्रयोग नितांत ज़रूरी होगा | वर्तमान ( COVID – 19 ) के संक्रमण का स्पीयर या स्प्यूटम से रिसेंट सैन्यूल लेकर नोसोड तैयार हो तो अति उत्तम , अन्यथा उसका 1/1000 dil . preparation ( 3 POWER ) का मास इनोकुलेसन ( ओरल ) का ट्राइकर शोध किया जाय | ये मेरे अपने विचार हैं । लेकिन विज्ञान सम्मत है |
 STRIKE THE IRON WHILE IT IS HOT , आवश्यकता ही आविष्कार का सही वक्त है | होमेयोपैथ चिकित्सकों के लिए यह सर्वाधिक महत्त्व का समय है | सिर्फ सूपरफीशियल टॉक से निदान नहीं हो सकता | जेनियस एपिडेमिक्स पर भी मंथन किया जाना चाहिए | उसके लिए From infection to death तक की क्रमागत अवस्था में आई symptom पर ही – की जाए ।
हनिमैनियन प्रिंसिपल का पूर्ण पालन हो , इसका सैंपल पूर्ण विकसित रोगी से लिया जाए | जहाँ पर गंभीर आउटब्रेक हुआ हो , उसकी समीक्षा ही लक्षणों की वास्तविकता और मैथोडोलॉजी का निर्वहन होना चाहिए | एक दो रोगी के उपर जिनका अनुभव हो वे कभी हल्का निर्णय न लें | शोधकर्ता वहीं हो जो एन्साइक्लोपीडिया से पूविंग डाटा लेकर ही चले और उसी मार्ग पर कार्यक्रम हो । शोधकर्ता को टॉक्सीकोलॉजिकल एक्सपीरियेन्स चाहिए | आजकल चोरी से पुस्तकें लिखी जाती हैं , और सेमिनारों में अपना कोई अनुभव न रखते हुए इंटरनेट से आर्टिकल तैयार होता है | कांफ्रेंस में मनिप्युलेटेड आडीया प्रस्तुत किया जाता है | होमेयोपैथी की शिकायत नहीं होनी चाहिए | इतनी सारी उच्च संभावनाओं तथा आरोग्यदायिनि ख्याति के बाद भी होमेयोपैथी को अवैज्ञानिक बतानेवालों की कमी नहीं है | हमारे ऐसे भी होमेयोपैथिक पॅक्टिशनर हैं जो हनिमैन के सिद्धांतों से हटकर चलते और अपने को महान चिकित्सक मानते हैं । मैं 1976 से सदा होमेयोपैथी के अंतरराष्ट्रीय एवम् राष्ट्रीय मंचों पर भाग लिया हूँ और सत्यता कहाँ है , उसका अनुमान लगता रहा हूँ | इस दिशा में कोई प्रशंसनीय कदम नहीं उठा पाया है | करना तो हमारा धर्म है | सामने ज़रूरत है । सफल होने की उत्प्रेक्षा है | समस्या गंभीर है | इस जंग को जीतने में विश्व का कल्याण निहित है । देर न करें | मैं 100 % सत्य राय दे रहा हूँ | अनुभव और अध्ययन की बात करता हूँ । मेरा अंतिम क्षण में आपसे यह आग्रह है | अथवा स्वर्गीय हनिमैन महोदय की आत्मा का संदेश है |
 होमेयोपैथिक प्रैक्टिशनर इज नॉट ओन्ली ए मिनियट अब्जर्वर , बट प्रिज़र्वर ऑफ हेल्थ | ही शुड वॉर्क फॉर हाइयेस्ट पर्पसेज ऑफ लाइफ एग्ज़िस्टेन्स |
Homoeopathy is a trace , we have to go ahead . उल्लेखनीय है की अबतक कोरोना के सन्दर्भ में जिन क्रमों में जानकारियाँ हमें मिल रही हैं , उसमें भी त्रुटिपूर्ण एवम् भ्रमात्मक आभास होता है | कारण यह है की मेडिकल विषय को मीडियावाले अगर रिपोर्ट करें तो कमी या भूल हो सकती है | हम यह भी कहना आवश्यक  समझते हैं कि इस जंग के पीछे राजनैतिक चक्र का होना अस्वीकार नहीं किया जा सकता | लेकिन विज्ञान के रास्ते पर राजनीति मानवता के हित में बाधक हो सकता है ।
 मैं तो चिंतित था की आयुष ( होमेयो ० ) की ओर से लिखित वक्तव्य अबतक साझा नहीं हुआ था लेकिन जो कुछ सामने आया तो उससे लगा की हमारा क्षेत्र भी संवेदित हुआ किंतु यह पहल अधूरा है | इसे पूर्णत : वैज्ञानिक एवम् सामाजिक प्रक्रिया से गुजर कर सामने आना चाहिए | अपने देश में होमेयोपैथिक अनुसंधान पार्षद अब तक इस पर अपना कोई पहल नही रखा है | इस दिशा में उनका साइलेंट रहना चिंता की बात है | हमें यह जानकर दुख हुआ कि विश्व स्तर पर कोरोना के लिए मेडिकली पहल न हो पाया । हनिमैन के मार्ग पर चलने वाले डा . जे . जे . गर्थ जैसे कुछ लोगों ने जो अपना कीर्तिमान छोड़ रखा है वह हमें सही मार्ग दर्शन देता है । उस पर विचार करें । इस पर राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श होना चाहिए | सीधे आयुष के नाम पर जो कुछ भी अब तक प्रकाशित हुआ , वह आयुर्वेद की झोली में जाकर ठहरा और उसकी ही तारीफ़ हुई जो मैं भी स्वीकारता हूँ | सराहना भी करता | मेरे विचार स होमेयोपैथी को खड़ा करने की ज़रूरत है ।
 डा . जी . भक्त
 * Director , Progressive Scientific , Medical and Literary Reasearch Foundation , HAJIPUR , VAISHALI ( BIHAR )

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