Mon. Apr 15th, 2024

प्रभाग-33 रावण वध, छठा सोपान, लंका काण्ड, रामचरितमानस

कुभकरण और मेघनाथ का मरण लंका के राक्षस कुल के इतिहास का अंतिम चरण बना लंकापति रावण का अहंकार आज चूल में मिल रहा है राज भवन में बैठी मंदोदरी छाती पीट-पीटकर रोती और बहुत प्रकार से नाम पुकार पुकार विलाप कर रही है रावण, जो कभी ऐसा विश्वास ही करता था या अभिमान के सामने मृत्यु को कुछ नहीं समझता था, वह जीवन की निस्सारता पर मंदोदरी सहित सभी नारियों को दर्द सहित समझा रहा है सारा नगर व्याकुलता वस सोचकर रावण को ही दोषी बतला रहा है। रावण का ज्ञानोपदेश सबके लिए शुभ और पवित्र है किन्तु वह नीच है। इसलिए कि वह अपने जीवन में उसे स्थान न दे पाया। अहंकार और सिर्फ अहंकार के वश में वह ज्ञान की मर्यादा समाप्त कर डाला। ज्ञानी, पराक्रमी, मायादी और विजयी रावण नीति की मर्यादा नही बचा सका आज मात्र वह लंका में अकेला पड़ा हुआ हतप्रम और निराश है। उसकी वाणी ही बतलाती है। अपने आप को दोषी ठहरा रहा है फिर भी शरणागत होना नहीं चाहता।

निशा सिरानि भयउ मिनु सारा। लगे भालु कपि चारिहु द्वारा।।
सुमट बोलाई दशानन बोला। रण सम्मुख जाकर मन डोला।।

सो अबहु बरु जाई पराई। संजुग विमुख भये न मलाई ।।
निज भुजबल में वयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा।।

अस कहि मरुत वेग रथ साजा।बाजे सकल जुझाडू बाजा ।।
असगुन अमित होहि तेहि काला।गनई न भुजवल गर्व विशाला ।।

छन्द: अति गर्व गनई न सगुन असगुन स्रवहि आयुध हाथसे।
गट गिरत रथते बाजि गज चिककरत मानहि साथ से।।

गोमात्र गीध कराल खर ख स्वान बोलहि अति धने।
जनु काल दूत उलूक बोलहि बचन परम भयावने।।

पराक्रमी के दिन भी विपरीत पड़ गये जो जीवों के द्रोह में रत कामारक्त, राम दिमुख, मोह के वशीभूत है क्या कभी स्वप्न में मा सम्पति, शुभ शकुन और चित्त की शान्ति मिल सकती है ?

कहई दशानन सुनहु सुमट्टा मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा ।।
ही मरिहउँ भूप दो भाई अस कहि सम्मुख फोज रेंगाई ।।
यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई चाए करि रघुवीर दोहाई ।।

दो० दुहु दिशि जय जयकार करि, निज निज जोरि जानि।
भिड़े वीर उत रामहि उत रावनहि वखानि ।।

सवन रथी विष रघुवीरा देखि विभीषण भयउ अधीरा ।।
अधिकप्रीति मन भा सन्देहा यदि चरण कह सहित सनेहा ।।

नाथ न रथ नहि तन पद त्राणा।केहि विधिजितव बीर बलवाना।।
सुनहु सखा कह कृपा निधाना। जेहि जय होई सो स्यदन आना।।

सौ रज धीरज जेहि रथ चाका।सत्य शील दृढ ध्वजा पताका।।
बल विवेक दम परहित घोरे। क्षमा कृषा समता रजु जोरे ।।

ईश भजनु सारथि सजाना। विरति धर्म संतोष कृपाना।।
दान परशु बुद्धि शक्ति प्रचंडा, वर विज्ञान कठिन को दंडा।।

अमल अचल मन त्रोण समाना ।सम जम नियम सिलिमुख नाना।।
कवच अमेद विप्र गुरु पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।

सखा धर्म गय अस रथ जाकें। जीतन कहें न कतहु रिपु ताके ।।

दो० महा अजय संसार रिपु जीति सकई सो वीर।
जाके अस रथ होई दृढ सुनहु सखा मति धीर।।

सुनि प्रभु वचन विभीषण, हरवे गहि पद कंज।
एहि विधि मोहि उपदेशहु, राम कृपा सुख पुंज।

उत पचार दशकंधर, इत अंगद हनुमान।
लड़त निशाचर भालू कपि की निज निज प्रभु आन।।

ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानों पर चढ़े हुए आकाश से युद्ध देख रहे हैं शिव जी कहते है कि हे उमा । मैं भी उस समाज में रहकर रामजी के रणरंग की लीला देख रहा था।

दोनों ओर से योद्धा रण-रस में मतवालें दिखाई दे रहे थे। वानरों की सेना को राम जी का बल प्राप्त है इसलिए ये जीत की आशा से उत्साहित है एक दूसरे से भिरते है। उन्हें मसल मसलकर पृथ्वी पर डाल देते है ये मारते काटते, पकड़ कर पछाड़ देते हैं। सिर तोड़कर उन्हीं सिरों से दूसरों को मारते है पेट फाड़ते हैं भुजाएँ उखाड़ फेंकते हैं। योद्धाओं का पैर पकड़कर पृथ्वी पर पटक देते हैं शत्रुओं के विरुद्ध हुए वानर क्रोध के मारे काल की तरह दीखते हैं।

अपने दल को विचलित देख दशानन अपनी बीस भुजाओं में 10 धनुष धारण कर रथ पर बैठकर गर्व से उन्हें लौटने के लिए कहता हुआ चला।

धायो परम कुछ दशकंधर। सन्मुख चले हू दे बन्दर ।।
गहि कर पादप, उपल प्रहारा। डारेहि वापर एक ही बारा।।

लागहि शैल वज तब तासू।खण्ड-खण्ड होई फूटहि आँसू ।।
चला न अचल रहा स्थरोपी। सम दुर्मद रावण अति क्रोधी ।।

इत उत झपटि उपटि कपि जोधा मर्द लाग भयउ अति क्रोधा ।।

अनेको वानर, भालू, हनुमान और अंगद की दुहाई देते हुए रक्षा करो, रक्षा करो, ऐसा कहकर पुकारने लगे। तब रावण दशो धनुष पर वाण साधकर नाग की भाँति वाणों की वर्षा करने लगा, जिससे घोर आतंक छा गया। रामादल की सेना भागने लगी। तब लक्ष्मण जी ने तरकस कमर में कस ली और क्रोधित हो रामजी का नाम लेकर रण में कूद पड़े। बोले रे सद, तुम वानर भालुओं को क्या मर रहा है मुझे देख मैं तेरा काल है। तब रावण बोला- रे मेरे पुत्र का प्राण हरण करने वाला, मैं तुम्हें ही दूढ़ रहा था। आज तुझे मारकर अपनी छाती ठंढा करूँगा। ऐसा कहकर जब रावण अपना प्रचण्ड बाण छोड़ा तो लक्ष्मण जी ने सबके सैकड़ों खण्ड कर डाले रावण के चलाये सभी अस्त्र-शस्त्रों को तिलके बराबर काट-काट कर हटा दिया फिर अपने वाणों से लक्ष्मण जी ने उस पर प्रहार करके रथ को तोड़ सारथि को मार डाला उसके दशों मस्तकों में सौ-सौ वाण डाले, फिर सौ वाण उसकी छाती में लगे वह पृथ्वी पर बेहोश पड़ गया जब वह होश में आया तो ब्रह्माजी द्वारा प्राप्त उस शक्ति का प्रयोग किया लक्ष्मण जी व्याकुल होकर गिरे। रावण उन्हें उठाने के लिए घोर प्रयास किया किन्तु वे उठ न पाये। यह देख हनुमान जी दौड़े तो रावण ने घूसे का प्रहार किया हनुमान गिरे तो नहीं पाँव टेककर डटे रहे। तब उन्होंने अपना घुसा रावण पर अजमाया। जब वह बज्र की भाँति धरती पर गिरा फिर वह हनुमान जी के बल की सराहना करने लगा। हनुमान जी ने कहा- तुझे धिक्कार है, तुम्हारे पौरुष को और मुझे भी धिक्कार है कि तुम जैसा देव द्रोही अब भी जिन्दा बचा है। इसके बाद लक्ष्मण जी को उठाकर लाये ये देख रावण विस्मित हुआ।

अब रावण जाकर कठिन यज्ञ प्रारंभ किया। देखिये, रावण कितना मूर्ख है। रामजी के विरुद्ध वह अपनी विजय चाहता है। उसका हठ निरी मूर्खता है जब विभीषण को इसकी जानकारी मिली तो वह रामजी से सब बतला दिया। रामचन्द्र जी ने अंगद वगैरह वीरों को वहाँ भेजकर आक्रमण करवाया। अंगद ने यह कहकर लातमारी कि रण से भागकर यहाँ क्या बगुले की तरह ध्यान लगाया है ? जब रावण नहीं चेता तो वानरों ने लातों से रौद डाला। निशिचरियों का झटा पकड़कर मारना शुरु किया तब क्रोधित रावण उठकर बाहर आया तब तक वानरों ने जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला।

जग्य विध्वंसि कुशल कपि आये रघुपति पास।
चले निशाचर क्रुद्ध होई त्यागि जीवन के आस।।

चलत होहि अति अशुभ भयंकर। बैठहि गीध उड़ाई सिरन्ह पर ।।
भयउ काल वश काहु न माना। कहसि बजावहु युद्ध निशाना ।।

महानिवाण का समय करीब आ चुका है। राक्षस पति सब कुछ गंवा चुका है। जो कुछ बचा है वह प्राण है या अभिमान मात्र अबतक वह अपना सर्वस्व राम की दया रूपी सागर में नहीं डाल सका तो उनके क्रोध की ज्वाला में भस्म तो करेगा ही। आखिर माहमिमानी रावण क्या करेगा ? रावण की बहन का रामाश्रय में जाकर प्रणय सम्वाद राम रावण संग्राम का आहान बना और उसकी झाँकी अबतक विभिन्न आयामों में चित्रित हो चुका। अब जो शेष रहा, वह सीता की वापसी की प्रतीक्षा भर रावण का मरण तो करीब हो चुका है। मै तो रामायण का यह पाँचवा स्वाध्याय कर रहा हूँ आज को तिथि को रावण का अन्त (14.02.2019 ) है रावणत्व की समाप्ति नहीं रामचन्द्र जी के समय के बाद सभी आर्यावर्त की भूमि पर हिनाने परिदृश्य मिले नहीं समस्त राजनैतिक नेतृत्त्व कल्याण के लिए सृजित होते हैं हमारा क्या कतव्य है ?

“सिव राम मय सब जग जानी करचें प्रणाम जोरि जुग पानी।।”

……..लेकिन रामतत्त्व अपनाया गया नहीं सहस्त्रों वर्ष बीते रामायण का गायन, पाठन, पूजन और प्रचार-प्रसार चला, यह भी धीमा पड़ता गया। आज फिर भारत की भूमि आज्ञानान्धकार में नियम, नीति, भक्ति, ज्ञान धर्म और कर्म की शुचिता खो रहा है। अपने इस सोच विधान में एक युगान्तकारी अभियान की अभ्यर्थना इसके साथ जोड़ने की आकांक्षा है जो 12 दिसम्बर 2018 शनिवार को इस साधना की समाप्ति कर कृपा निधान से उस सारस्वत अभियान के प्रेरणार्थ प्रणत निवेदन किया ताकि ज्ञान की रश्मि जो चूमिल हो रही है उसमें जागृति और परिणति के पहल हो पाये। एतद्विषयक भाव का संप्रेषण नवीन पीढ़ी में नवजीवन की शुरुआत हेतु राम विवाह के अवसर पर एक शुभ संदेश बनकर जन-जन में जागृति लाये।

त्रेता युग के संदर्भ में यह बात पहले से चली आ रही है कि ब्राह्मण का अपमान उसके शाप से कटता है और वह एक जन्म में मुक्ति नहीं पाता, तीन जन्म लगते हैं। रामायण इसका प्रतीक बना राम और रावण का अवतरण तीन संक्रमण पार किया। लगता है कि तृतीय संक्रमण में रावण जितना बड़ा अहंकारी पुरुष के रूप में जाया उसका पाप कितना भयानक रहा होगा ? वह अहंकारी से भी बड़ा पराक्रमी था। मायावी था, ज्ञानी और

तपस्वी भी जब रामचन्द्र जी भक्तवत्सल शरणागत वत्सल और सेवकों के परायण थे। जहाँ मुनिमन रंजन थे वही पाप विनंजन भी लेकिन लगता है कि पतित पावन भगवान रावण को शरण दी उन्हें मुक्त किया, किन्तु रावणत्त्व शेष रहा, आज भी है रामायण में राम राज्य का वर्णन है। गाँधी जी ने भारत में राम राज्य की कल्पना की आज राम की जन्म भूमि में राम राज्य का स्वरूप नहीं मिलता। आज यहाँ भी संक्रान्तिकाल का दस्तक पड़ चुका लगता है। यह धर्म प्रधान, कृषि प्रधान और ज्ञान की खान जाना जाता रहा तो यह संस्कार सबके साम्राज्य के बाद पनपा कैसे ? जिस तरह शंकर जी ने पार्वती जी का मोह निवारण किया। याग्वत्वय जी ने भारद्वाज मुनि का भ्रम भंजन किया। काग जी ने गरुड़ जी का ऐसी परिस्थिति में सन्त कवि तुलसीदास की अवधारणा है कि इस कलि काल में ज्ञान, भक्ति, यज्ञ, तप, व्रत आदि की परम्परा घटेगी तथा तमोगुण पराकाष्ठा पर रहेगा। सिर्फ राम तत्त्व का स्मरण मात्र ही से कष्टों का निवारण हो जायेगा। मैं मानता हूँ कि आज की शब्दावलि में विकास ही सर्वोपरि लक्ष्य है आध्यात्म नहीं विकास या समृद्धि में उपभोक्तावाद ही सर्वमान्य है भौतिकता भोगवादिता का पर्याय है भौतिकता में शुचिता का अभाव अनैतिकता है अनीति और अशीच से मानसिक, राजनैतिक, सामाजिक, दैहिक और दैविक दुःख या कष्ट बढ़ता है। इन दूषणों का निवारण गुणात्मक शिक्षा से ही (मूल्य) परक शिक्षण से) सम्भव है जो आज पतनोन्मुख है।

सरस्वती राम चरित मानस में दो स्थानों पर देवहित लागि” अपनी भूमिका निभाई है मंथरा कैकेयी संवाद में तथा “भरत मिलन में आज तो उनका देश स्वतंत्र है। ऐसी परिस्थिति में विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरलता से इस पीढ़ि का हृदय परिवर्तन कर शैक्षिक परिवेशादि और जन नेतृत्व को शुचिता से विभूषित कर सकती हैं मेरी कामना है, अमीत्सा है, प्रत्याशा में हूँ और प्रयासरत भी।

अतएव जगदात्मा को परमात्मा के सान्निध्य में लाकर भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना में राम रत्व का अवगाहन सुलभ और सुगम हो अर्वाचीन परिवेश में सामाजिक सरोकारों की सार्थकता में ही ज्ञान और भक्ति का प्रतिलन राम तत्त्व का प्रत्यक्षीकरण होगा। आज सीता हरण ही नही होता. प्रताडना शोषण, परित्याग ही नही, हिंसातक होती है। लौकिक संकष्टों को पारलौकिक मोक्ष एक प्रकार से विश्वसनीयता को जन्म देता है. पादर्शिता का भ्रम बना ही रहता है उसे आत्मिक उपलब्धि वाली दृष्टि की जरूरत है।
….किन्तु ब्रह्म और जीवन का भेद जानना ही दृष्टि है, बाकी सब मोह या
भ्रम है वही रावणत्व है जिसका कल नाश होगा वही राम तत्त्व होगा जो अन्तिम शरण देगा। अभी युद्ध चल ही रहा है या अभी उसकी आयु शेष है उसकी राक्षसी सेना का संहार करीब हो चुका है। फिर भी वह अकेले कैसे लड़े ? उस हेतु उसने और माया जाल रचना शुरु किया। राम भी खाली पैर लड़ रहे है। देवताओं को यह देखते विचित्र लगा देवराज इन्द्र ने अपना रथ मातलि नामक सारवि के साथ भेजा रथ पर सवार होकर राम की दिव्यता अब सामने आयी। उधर रावण की माया ने अपनी ही सेना में अनगिनत राम और लक्ष्मण खड़े किये यह देख भगवान स्वयं आश्चर्य में पड़ गये। अपने पक्ष के सैन्य दल को भयमीत जान एक ही वाण में सारी माया का नाश कर दिया। विभत्सता और दुर्जनता से काम लेने वाला दुष्ट रावण अपना युद्ध बढ़ाता रहा तब प्रभु ने ललकारा। उसे काल के वश होकर बकवाद करते सुन हँसकर बोले अरे मूर्ख, मैं जान गया कि तुम जो कहते हो वह सब सौ आने सच है। वकबाद बन्दर कर पुरुषार्थ तो दर्शाओ प्रभु श्री रामजी न रावण को सीख देते हुए कहा कि संसार में तीन प्रकार के वृक्ष होते हैं (1) गुलाब का पेड़ जिसमें केवल फूल होते है (2) आम का वृक्ष जिसमें फल और फूल दोनों होते है। (3) पनस या कटहल का वृक्ष जिसमें सिर्फ फल लगते है फूल नहीं।

वैसे ही पुरुष भी तीन प्रकार होते हैं। एक सिर्फ कहते है करते नहीं दूसरे कहते तो करते भी हैं। तीसरे सिर्फ करते हैं कहते नहीं। लेकिन रावण विवेक खो चुका है, समझता नहीं रामचन्द्र जी की बात उसे नहीं सुहायी उनकी बात सुनकर जोड़ो से हँसकर कहा- मुझे ज्ञान सिखलाते हो, पैर करते डर नहीं लगा था ? अब प्राण प्यारा लग रहा है? ऐसा कहकर वह पुन वर्णों की वर्षा करता रहा।

उधर सीता जी लगातार युद्ध मार-काट सुनती हुयी महाबली रावण के नहीं मारे जाने से व्याकुल हो रही है। त्रिजटा कहती है कि रावण के मन में सीता जी बैठी है इसलिए जबतक रावण का सर देह से अलग नहीं होगा, तब तक उसे सीता का मोह मरने नहीं देगा। उधर मायावी रावण तरह-तरह का खेल खेल रहा है। इधर कृपा निधान भगवान उसका जबाव देते चले जा रहे है लम्बा युद्ध चलते रहने से वानर भालू परेशान हो रहे हैं। सिर्फ उन्हें रामजी पर भरोसा है तब विभीषण ने कहा कि रावण के नाभि कुछ में अमृत है, उसे सोखे बिना उसके प्राण विदा न होंगे। आखिर यह उसी माया पति भवान की ही लीला है जो जगत को स्वयं दिखला रहे हैं। एक ही माया और रावण की मूर्खता का खेल खेला जा रहा है तुरंत रामजी ने एक ही बाण में माया का अन्त कर दिया।

छन्द – भाया विगत कपि भालु हरये विटप गिरि गहि सब फिरे।
सर निकर छाड़े राम रावण बाहु सिर धुनिमहि गिरे।

दो० खंचि सरासन अवण लगि छाडे सर एकतीस ।
रघुनायक सायक चले मानहु काल फनीस।।

सायक एक नाभि सर सोखा। अपर लगे भुज सिर करि राषा ।।
लैसिर बाहु घले नाराचा। सिर भुज हीन रुण्ड महि नाथा ।।

घरनि घसई घर पाँव प्रचण्डा। तब सिर हति सिर कृत दुइ खडा।।
गर्जे मरत घोर ख भारी। कहा रामखहतौ चारी ।।

डोली भूमि गिरत दशकंधर छुर्मित सिन्धु सरि दिग्गज भूधरण।।
घरनि परेउ दी खण्ड बढाई। जानि भालू मर्कट समुदाई ।।

मंदोदरी आगे भुज सीसा। घरि सर चले जहाँ जगदीशा ।।
प्रविशे सब निषंग महुजाई । देखि सुरन्ह दुंदुभी बजाइ ।।

तासु तेज समान प्रभु आनन । हरषे देखि शंम्भु चतुरानन ।।
जय जय धुनि पूरी ब्रह्मण्डा। जय रघुवीर प्रवल मुजदंडा ।।
वरषहि समन देव मुनि वृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकंदा।।

वरुण कुवेर सुरेश समीरा। रन सम्मुख धरिकाहु न धीरा ।।
भुजवल जीउ काल जमसाई। आजु परेउ अनाथ की नाई ।।

जगत विदित तुम्हार प्रभुताई। सुत परिजन बलवरनिन जाई ।।
सम विमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कुल कोई रावन हारा।।

तब वस विधि प्रपंच सब नाथा । समय दिक्षिप नित नावहि माथा ।।
अब तक सिर भुज जंवुक खाही। राम विमुख यह अनुचित नाही ।।

काल विवस पति कहन न माना। अग जग नाथु मनुजकरि जाना।। ।

दो० अहह नाथ रघुनाथ सम कृपा सिन्धु नहि आन ।
जोगी वृन्द दुर्लभ गति तेहि दीन्ह भगवान ।।

मंदोदरी वचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सवहि सुख माना ।।
अज महेश नारद समकादी । जे मुनिवर परमारथवादी ।।

मरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम भगन सब भये सुखारी ।।
रुदन करत देखि सब नारी। अपउ विभीषण मन दुख भारी ।।

बन्धु दसा विलोकि दुख कीन्हा । तब प्रभु अनुजहि आसयु दीन्हा ।।
लछिमन तेहि वहु विधि समुझावा । बहुरि विभीषण प्रभु पहि आवा ।।

कृपा दृष्टि प्रभु ताहि विलोका। करहु क्रिया परिहरि सवसोका।।
कीन्ही क्रिया प्रभु आयु मानी। विधिवत देश काल जिमि जानी ।।

दो० मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि ।
भवन गयी रघुपति गुण गन वरमत मन माहि ।।

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