Mon. Apr 13th, 2026

    भाग-3 ईशोपासना

     

     51. उपासना एक भाव है ।

     52. उपासना से शान्ति फलती है ।

     53. उपासना से मन को तृप्ति मिलती है ।

     54. उपासना ब्रह्मतत्त्व का आहवान है । और सोपान भी ।

     55. उपाना में इन्द्रियों का संयम है ।

     56. उपासना ईश का अवगाहन है ।

     57. उपासना ज्ञान दीप का प्रज्जवलन है ।

     58. उपासना में देवत्त्व की अनुभूति है ।

     59. उपासना तत्लीनता का पर्यायय है ।

     60. उपासना अष्टांग योग का नियम ( ईश्वर प्रणिधान है )

     61. उपासना से धारण दृढ़ होती है ।

     62. उपासना से ध्यान को बल मिलता है ।

     63. ईश्वराराधन में ईश्वर की महिमा का गुणगान मात्र है ।

     64. ईशोपासना में गहन निष्ठा का बोध होता है ।

     65. सरस्वती की दूसरी संज्ञा वाणी है ।

     66. विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री शारदा देवी हमारी साधना में सहायिका बनती है ।

     67. साहित्य साधना , काव्य साधना , ग्रंथ रचना , वाचन गायन , बन्दनादि सारस्वत या शारदीय अभिव्यंजना वीणा पाणि की अर्चना जीयर्थना है । साहित्यिक समाज शैक्षिक समूह सारे सरस्वती पुत्र हैं ।

     68. संयोग वशात आज हम 2014 , माध शुक्ल वसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती की पूजा आराधना में व्यस्त है । आज निराला जयन्ती भी है ।

     69 लगातार 5 हजार वर्षों की काव्य परम्परा में महाभाग्य , भारतीय आत्मा निराला छन्दबद्ध काव्य रचना को मुक्त आयाम प्रदान करने वाले ने हिनी में प्रथम प्रयोगधर्मिता प्रदान की । ये हिन्दी साहित्य के छायावादी युग में मुख्य स्तंभ के रुप में काव्य साधना किये एवं अंत में प्रगतिवाद के साथ अपने साहित्यिक जीवन का अवसान पाया ।

     70. ” निराला ” में अपनी जिस ” भिक्षुक ” कविता की रचना में भारतीय सामंती समाज द्वारा अकथनीय दैन्य दशा में सड़कों के पदतल पर गुजड़ते भिखारी का चित्र रखकर सरस्वती को समर्पित किया शायद माता की ममता में भिखारी अचिंत्य रहा । क्योंकि अर्चना अभी शेष पड़ी है ।

     71. यह हमारा ज्ञानात्मक शोध है । ईश को समर्पित प्रबुद्ध – शुद्ध सारस्वत मेधा को संबोधित , छात्र – छात्रा शिक्षाी , शिक्षक , शिक्षा विभाग अध्यापक – अध्यापिका व्याख्याता , प्राचार्य , शिक्षा पदाधिकारी , शिक्षामंत्री , उपकुलपति , कुलपति – सह कुलधिपति एवं महामहिन जी किसकी सुनेंगे । कभी मन में आया तो बोल लेते हैं । देखना और सुनना उनका दायित्त्व नहीं । यही कारण है कि हम “ येषा न विद्या , न तपो न धर्मः ” की संज्ञा दोते हुए अमानव है चूंकि मानव की सुनते नहीं । देश की शारदा ही मन्द हो गयी है ।

     72. आज ईशोपासना की जगह सरस्वती की साधना में संलग्न होने की आवश्यकता है । दोनों का मौलिक लक्ष्य एक ही है ।

     73. साधना विधान हमारे जीवन का आलम्वन है । हम उसी पथ पर बढ़कर अपना लक्ष्य पाते हैं ।

     74. उपासक और साधक भिन्न नहीं । साधक प्रस्फुट जीवन जीता है । वह मार्ग की कल्पना और सर्जना दोनों ही करता है । विश्व को अपने जीवन से जोड़ता है । अन्यच्च , प्रयास भी करता है ।

     75. उसकी निजता का प्रसार ही समाज को खड़ा करता है । विश्व उसे देखकर अनुप्राणित होता है ।

     76. सकाम साधना से ही निष्कामता फलित होती है ।

     77. कभी हम भूख और तृषा से आतुर उद्याम पाते हैं ।

     78. कभी बच्चों की आवश्यकता से हाथ – पाँव को गति देते हैं ।

     79. भूमि का कर्षण करने वाले कृषक विश्व के आधार या रीढ़ बने हैं ।

     80. हम हल की पूजा करते हैं । हल भी हमारी भावना से परिचित है । वह सुनता है । धरती सुनती है । बैल सुनता है । लेकिन मानव नहीं सुनता ।

     81. जरथुस्त्र ने कहा – धरती पर किसान ही एक उत्पादक है । हम सभी उसके ऋणी हैं ।

     82. हमारा लक्ष्य हो कि ज्ञान और श्रम की मर्यादा बनी रहे ।

     83. हम अपना अनुशासन नहीं त्यागें । पग – पग पर वह हमारा पथ – प्रदर्शन करता है ।

     84. दायित्व बोध में कभी न लायें । यही हमें पूर्णता दिलाता है ।

     85. मानवीय मूल्यों का साथ न छोड़ें । यह आपको यश और सम्मान दिलायेगा ।

     86. परम सत्ता का स्मरण आप में उर्जा का संचार करेगा ।

     87. विश्व प्रेम की भावना अपको अभीष्ट प्रदान करेगी । 88. यह जगत असीम है ।

     89. यह जगत असीम है ?

     90. अनंतता ही इसकी सीमा है ।

     91. अव्यक्त इसका स्वरुप है ।

     92. विविधता इसकी पहचान है ।

     93. एकता इसका बन्धन है ।

     94. जीवन्तता इसकी भाषा है ।

     95. इसका अनन्तरुप अनन्त सृष्टि का बीज है ।

     96. हम इसे प्रकृति कहते हैं ।

     97. वह आकाश ( शून्य ) में स्थिर है ।

     98. आकाश ही हमारा अगोचर ब्रह्म हैं ।

     ” यद् खं तद् ब्रह्म ” ।