Wed. Feb 1st, 2023

 IMPACT OF MEDICAL

Science , Systems And Their Respective Advantages .

 Dr. G. Bhakta

कोरोना काल में चिकित्सा विज्ञान , चिकित्सा पद्धतियाँ एवं उनके अपने – अपने प्रभाव और पहल

 मानवहित में विश्व की ज्ञान और विज्ञान की संस्कृति और परम्परा अलग – अलग देशों में काल और परिस्थिति वश उत्थान – पतन झेलकर कमजोर भले ही हुयी किन्तु अपनी भूमि पर आज भी जीवित है और अपनी भूमिका निभाती आ रही है अपने प्रयास , अर्थ निवेश और सतत संलग्नता से उनका विकास धरातल पर देखा जाता रहा । राहत मिली । संतोष पाया किन्तु उपेक्षानूकुल उनकी उपलब्धि स्वास्थ्य एवं आरोग्य के लक्ष्य एवं उद्देश्य के सापेक्ष जरुरी था ।

 जीवन का लक्ष्य जड़ प्रकृति सोच पायो । उसने सृष्टि का विधान रचा तो जीव की उत्पत्ति के पूर्व धरती पर वनस्पति और छोटे जीवों की उत्पत्ति हो चुकी थी जिससे उनका पोषण और संसाधन संग्रह में कठिनाइ न हो । उसी प्रकार का लक्ष्य हम चेतन मानव प्राणियों का होना चाहिए । सुख , सम्प्रदा , आराम और सुन्दर स्वास्थ्य आत्म तुष्टि और कल्याण कार्य का विधान जब आवश्यक माना गया तो प्रकृति का संरक्षण और जागृतिक कल्याण वं परमार्थिक लक्ष्य का ख्याल भी होना चाहिए था । इसके लिए मानव सदा प्रयत्नशील और विचार प्रखर रहा किन्तु सुख – आराम में खोया नही , तो एक विकसित दुनियाँ तैयार कर पाया । आज इतना जरुरी था कि अपनी रची – रचाई संस्कृति और सभ्यता को संरक्षित रखने के लिए प्रकृति पर आधात न हो , स्वयं स्वस्थ और सकारात्मक सोच वाला बने तथा प्रेम , एकता और आपसी सद्भाव बना रहे ।

 आज समृद्धि में अहकार , विकास में संग्रह , सुख में आराम और व्यसन तथा स्वार्थ भाव पाकर मानव सिमट रहा । अस्वस्थता ही अर्जित कर रहा तथा प्राकृतिक साधनों का जितना अपव्यय हुआ उतना ही प्रदूषण पाया । आज विनाश की ओर बढ़ रहा ।

 यह जो हमारी संकुचित सोच , विकास में आप्रत्याशित विराम लाकर स्वार्थी और उपभोक्तावादी बना उसमें उसका भविष्य कुंठित होने से चिंतित कर रखा है । जो ज्ञान और विज्ञान को बढ़ाया वही उस पर धूल जमाने का काम किया । ज्ञान कर्म का सामंजस्य टूटना , हमे श्री विहीन बना डाला । उसको सुधारना ही आत्म रक्षा के साथ कल्याणकारी पथ को प्रशस्त कर सकता है । हमारा चिन्तन विध्वंशकारी न हो ।

 चिकित्सा जगत को सदा संरक्षक की भूमिका में उतरना चाहिए । सामाजिक दुर्गुणों , दैहिक रोगों तथा मन को अशान्त से बचाए । इन्ही लक्ष्यों और उपश्यों का सम्बल लेकर चलना दुनियाँ का कष्ट हरण कर सकता है । ज्ञान – कर्म दोनों में सकारात्मक संबंध स्थापित करना और प्रयोग में लाना उपलहियों को स्थायित्व देना और सम्भावित कष्टों के प्रति मानवता के उत्कर्ष पर चिनतनशील रहना , अपने अपने लक्ष्यों एवं योजनाओं से दुनिया का भार हरना ही सच्चे अर्थ में सबका साथ माना जा सकता है । महत्वाकांक्षा सामाजिक संबंधों को तोड़ने का कार्य करेगा अतः उसका त्याग होना चाहिए । व्यावसायिकता का भाव अन्ततः मानव को आत्म केन्द्रित ही बना सकता है । राजनीति , सामाजिक गठन और संसाधनों एवं हितो पर नियंत्रणात्मक कदम पर सदा विचारशील होना जरुरी है । उसे तोड़ कर हम कमजोर होंगे । जोड़कर उत्थान पायेंगे । अपनी – अपनी भूमिका में निश्छल भाव से बढ़ना ही लक्ष्य दिला सकेगा । संकीर्ण भाव कर्म को कुंठित ही करेगा तो हम जंग कैसे जीतेंगे ?

 विशुद्ध विकास को स्वच्छ सवाद और निश्छल संदेश को ही मानवीय व्यवहारों की उर्जा मानकर बढ़ना उचित होगा । कोरोना काल की चिन्ता मिटाने का लक्ष्य लेकर मैं एक चिकित्सक ( होमियोपैथ ) होकर अपने विज्ञान की पहुँच और सेवा की स्वचछता को विश्व के धरातल पर साझा करते हुए गूगल के साथ myxitiz.in पर लगातार संवादशील हूँ । पाठक भी पूरी दिलचस्पी से जुड़े हैं किन्तु उनके मन को मैं नही जान पा रहा हूँ कि मेरे प्रयास मनोरंजक बन रहे है या समाज के लिए हितकारी । अगर ऐसा संबंध साकार हो पायें , तब तो निश्चय ही सबके साथ की सच्चाई सामने आकर रहेगी और कोरोना की समाप्ति हो पायेगी । खासकर हम आशा रखते है कि हमारे विदेशी पाठक जो हमे दूर से प्रोत्साहित कर रहे हैं वे हमारी भावना से अवश्य ही जुड़े है । लगभव 200 से ज्यादा देशों में होमियोपैथी का प्रचलन है । इसकी सेवा और सम्भावना पर मनोयोग से आगे बढ़े तो हमारी आरोग्यकारी दवाओं , विचारों सिद्धान्तों , उपलब्यिों का प्रचार – प्रसार प्रशस्त इलाज की एक विस्तृत कड़ी बनकर विश्व को स्वस्थ और संरक्षित रुप में पा सकेगा ।

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