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प्रभाग-36 संत असंत के लक्षण, रामचरितमानस

सनकादिक मुनिगण के प्रस्थान के बाद तिनो भाइयों ने राम जी के चरणों में नमन किया। कुछ पुछते हुए उन्हें संकोच हुआ तो हनुमान जी की ओर देखते ही बने तब हनुमान जी ने कहा कि भरत जी की इच्छा कुछ कहने की हो रही है तब रामजी ने कहा कि संकोच किस बात का मेरे और भरत के बीच अन्तर कैसा ? भरत जी ने प्रभु के पैर पकड़ लिए। हे नाथ मुझे कुछ भी संदेह नहीं है और सपने में भी शोक और न मोह ही है केवल आपकी कृपा चाहिए। संतो की महिमा जिन्हें वेद पुराण गाये है वह कृपाकर कहें। आपने अपने श्री मुख से पहल भी उनकी बड़ाई की है और आपका संतो पर बढ़ा प्रेम है भी अतः मैं सुनना चाहता हूँ। आप तो कृपा के सागर और गुण एवं ज्ञान में निपुण है। संत और असंत के पृथक-पृथक भेद करके मुझे समझाइए तब भगवान ने कहाँ-

सन्तन्ह के लक्षण सुनु भ्राता अगणित स्रुति पुराण विख्याता ।।
संत असंतन्ह के असि करनी जिमि कुटार चन्दन आचरनी ।।
काटई परशु मलय सुनु भाई निज गुण देई सुगन्ध बसाई ।।
दो० ताते सुर सीसन्ह चढ़त जगवल्लभ श्रीखण्ड।
अनल दाहि पीटत घनहि परशु बदन यह दंड ।।
विषय अलपट शील गुणकर परदुख दुख सुख सुख देखे पर ।।
सम अभूत रिपु विमल विरागी सोभामरस हरण भय त्यागी।।
(क्रमश दोहा 41 तक)

श्रीराम जी के मुख से इतनी सारी बातें सुनकर सब भाइयों को इतनी प्रसन्नता हुयी कि उनके प्रेम का क्या कहना। वारंवार विनती करते है हनुमान जी भी काफी प्रसन्न हुए। फिर रामजी अपने घर गये। प्रतिदिन नयी लीला करते हैं। नारद जी बार-बार अयोध्या आते है और रामजी के पवित्राचरण का गुणगान करते हैं। फिर देवलोक में जाकर ब्रह्मा जी को सुनाते हैं। यह सुनकर ब्रह्मा जी का हृदय नहीं अघाता सनकादि मुनि भी उनके चरित्र की सराहना करते हैं। यद्यपि मुनिगण बह्य में सतत लीन रहते हैं फिर भी राम चरित्र से इतने मोहित होते है कि समाधि त्यागकर राम चरित्र देखने सुनने में रूचि लेते हैं जब जीवन मुक्त और ब्रह्मलीन मुनि भी ध्यान त्यागकर भगवान की लीला सुनते है तो जो उस लीला में रूचि नहीं लेते उनका हृदय कितना कठोर हैं ?

एकवार रामचन्द्र जी के बुलाने पर नगरवासी, गुरू और ब्राह्मण पहुंचे। सभी आसन पर बैठे भक्तों के कष्ट निवारक भगवान ने उनसे कहा- हे नगर वासियों मेरी वाणी सुनिये। मैं कुछ भी अपने हृदय में छिपाकर नहीं रखा है। न इसमें कुछ अनैतिक चर्चा है और न मैं अपनी प्रभुता की ही बात कहता हूँ उसे सुनकर आपको जैसा लगे वैसा ही करना।

सोई सेवक प्रियतम मम सोई मम अनुशासन माने जोई।।
जी अनीति में भासी भाई तो मोहि बरजहु मन विसराई ।।
बड़े भाग मानुष तन पावा सुर दुर्लभ सब ग्रन्थहि गावा।।
साधन धाम मोक्षकर द्वारा पाई न जेहि परलोक संवारा।।
दो० सो परत्र दुःख पावई सिर धुनि धुनि पछिताई।
कालहि कर्महि ईश्वर हि मिथ्या दोष लगाई।।
एहितन कर फल विषय न भाई स्वर्ग स्वल्प अन्त दुखदाई ।।
नर तनु पाई विषय मन देही पलटि सुधाते सठ विष लेही ।।
ताहि कवहु भल कहई न कोई गुंजा गहई परसमनि खोई।।
आकर चारि लच्छ चौरासी योनि भ्रमत यह जिन अविनासी।।
फिरत सदा माया कर प्रेरा काल कर्म स्वभाव गुण घेरा।।
किनहुक करि करुणा नर देहीं देत ईश दिनु हेत सनेही ।।
नर तनु भय वारिधि कहु बेरो सन्मुख मरूत अनुग्रह मेरो ।।
करनवार सदगुर दृढ नावा दुर्लभ साज सुलभ करिपावा ।।

यह शरीर जो मनुष्य का है, वह जब भवसागर पार करने के लिए जहाज बनता है तो भगवान की कृपा ही उनके लिए अनुकूल हवा बन जाती है। सदगुरू ही उसके नाव को खेने वाले होते हैं। इस प्रकार कठिनाई से मिलने वाले साधन भी सुलभ हो जाते हैं। इसी तरह भगवत्कृपा उन्हे प्राप्त हो जाती है।

दो० जोन तरै भव सागर, नरसमाज अस पाई।
सो कृत निंदक मंद मति आत्माहन गति ज्याई ।।

जौ परलोक इहो सुख चहुँ सुनि मम वचन हृदय दृढ़ हूँ ।।
सुलभ सुखद मारग यह भाई भगति केरि पुराण श्रुति गाई ।।
ज्ञान अगम प्रत्यूह अनेका साधन कठिन न मन कहु टेका।।
करत कष्ट बहु पावई कोउ मतिहीन मोहि प्रिय नही सोउ ।।
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी विनु सत्संग न पावई प्राणी।।
पुण्य पुंज विन मिलहिन संता सत्संगति संस्कृतिकर अंता ।।
पुण्य एक जग महु नही दूजा मन क्रम वचन विप्र पद पूजा ।।
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा । जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा ।।
दो० और एक गुप्त मत, सवहि कहउँ कर जोरि ।
शंकर भजन विना नर, भगति न पावई मोरि ।।
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा योगन मख जपतप उपवासा।।
सरल सुभाव नमनु कुटिलाई यथा लाभ संतोष सदाई ।।

जरा कहो तो, भक्ति मार्ग में कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योग की आवश्यकता है न जप, तप और उपवास की। यहाँ इतना ही आवश्यक है कि सरल स्वभाव हो मन में कुटिलता न हो, और जो कुछ मिले, उसी में सदा संतोष रखे।

मोर दास कहलाकर अगर कोई दूसरे मनुष्य की आशा करता है तो तुमही बताओ उसका क्या विश्वास है? मानो कि उसका मुझ पर विश्वास बहुत ही कम है। बहुत बातें बढ़ा कर क्या कहूँ.
मै तो उसी आचरण के वश में हूँ। वैर न विग्रह……

वैर न विग्रह आस न त्रासा। सुखभय ताहि सदा सब आशा ।।
आरंभ अनिकेत अमानी। अनध अरोष दच्छ विजयानी ।।
प्रीति रहत सज्जन संसर्गा तन सम विषम स्वर्ग अपवर्ग ।।
भगति पछ हठ नहि सठताई। दुष्ट कर्म सव द्वारिवहाई ।।
दो० मम गुण ग्राम नामरत, गत ममता मद मोह।
ताकर सुख सोई जानई। परमानन्द संदोहा।।
सुनत सुधा सम वचन रामके । गहे सवनि पद कृपानिधानके ।।
जननि जनक गुरु बन्धु हमारे कृपा निधान प्राण से प्यारे ।।
तनु धन धाम राम हितकारी सबविधि तुम प्रणतारति हारी।।
असि सिख तुम्ह बिनु देई न कोउ। मातु पिता स्वारथ रत ओउ ।।
हेतु रहित जग पर उपकारी तुम्ह तुमार सेवक अनुसारी ।।
स्वास्थ मीत सकल जग माही। सपनेहु प्रेम परमारथ नाही ।।
सबके वचन प्रेम रस साने सुनि रघुनाथ हृदय हरपाने ।।
निज निज गृह गये आयसु पाई। वरनत प्रभु बतकही सुहाई ।।
दो० उमा अवध वासी नर नारी कृतारथ रूप ।
ब्रह्म सच्चिदानन्द धन रघुनाथ जहँ भूप ।।

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