Tue. Jan 31st, 2023

रोटी कपड़ा और मकान

डॉ० जी० भक्त

इस धरती पर मनुष्य अन्य जीवों से इतना ही पृथक है कि उसकी बुनियादी माग कहें या राजनैतिक अधिकार या मानवता के नाते सत्तासीना की रहम रोटी, कपड़ा और मकान गम्भीरता से विचार कीजिए स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारे यहाँ के (वैशाली जिला तात्कालीन मुजफ्फरपुर का भाग) मुशहर जाति के लोग मजदूरी में चार आने (एक रूपये का चौथा भाग) पैसे एक पाव सत्त ही नशीब था नारियाँ एक वस्त्रा थी, बच्चे जाड़े में भी नंग स्त्रियों जिन्हें मजदूरी नहीं मिली. खेता में विखड़े अनाज चुनकर या शकरकन्द निकाले गये खेतो में भूला छूटा चुनकर लाना और बांटकर खाना नशीद था फूस की बनी झोपड़ी में रहने भर की छूट का मतलब कि उससे प्रतिदिन काम लेना जमीन मालिकों का अधिकार था अगर उनकी खेत में काम करने न गया तो झोपड़ी उजाड़ दी गयी। 1970 के दशक में करीव जिनको जमान में झोपड़ी थी, उतनी जमीन सर्वे में उसके नाम सरकार कर दी। जिसके पर्चे वासगीत जमीन के रूप में मिले। इस प्रकार आज भी बहुतेरे वेघर ह। कपड़े की व्यवस्था नहीं हुई। वासगीत जमीन मिल जाने पर उन्होंने मालिक से मुक्ति पा ली. बाहर उन्हें ज्यादा मजदूरी मिलने लगी महिलाओं को उससे कम महँगाई के साथ मजदूरी बढ़ी किन्तु सालोमर रोजगार की गारंटी नहीं कुछ रोजगार पाने के लिए दूर के राज्यों में निकल गये कुछ ईंट उद्योग में कुछ सड़को पर मिट्टी भरें। आज उन्हें सस्ते अन्न उपलब्ध कराये जा रहे है। सरकार द्वारा जो साल में 100 दिनों की रोजगार गारंटी का कार्ड मिला। वह मुखिया जी के जिम्में लाभुक चला परदेश उसका भी शोषण शुरू।

इससे ज्यादा कुछ नहीं। बाकी जनता में जो भूमिहीन ठहरे उनकी भी दशा समान ही, किन्तु उन्हें आज बी० पी० एल० स्तर में लेकर राशन की सुविधा समान रूप से मिल रही हैं। उन्हें गरीबों पर राजनीति जीवित है। सरकारी योजनाओं पर विविध प्रकार के लेवी लगे है। मध्यम किसान महंगायी और उपेक्षा के शिकार हैं। उनका आर्थिक शोषण कई रूपों में होता है। आर्थिक रूप से सुरक्षित नौकरी या व्यवसाय वाले है। सीमान्त किसानों और छोटा पूँजी के व्यवसाय वालों की जीवन आज भी ऊपर है शिक्षा, स्वास्थ्य, वस्त्रादि विवाहादि आयोजनों में ऋण से दब जाते है।

सत्तर वर्षो की आजादी का लेखा जोखा एक हसिए पर जीने वाले इंसान की जिन्दगी में लक्षित है। दूसरी ओर करोड़ों व्ययकर चुनाव जीतने वाले राजनेता के वेतन, भत्तो सुविधाएँ, साथ में और कुछ जो हो सके। शेष जनता में सरकारी गैर सरकारी कर्मचारी पदाधिकारी की चांदी करती है किन्तु उनकी कमाई तो आधुनिक उपभोक्तावाद को जाता है पूजीपत्तियों के (उद्योगपतियों) के पास शोषण और घोटाले जनतंत्र की रीढ़ है उसी की ईंट के गिर्द जनतंत्र की गाड़ी की रफ़्तार चल रही है जो इस युग का मूल मंत्र (पैसा फेंको ) न समझ वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारो से गया।

देश पर भ्रष्टाचार आन्तरिक और बाहरी आतंक बाद भाई भतीजा वाद, उदारीकरण, वैश्वीकरण का छदन खेल, योजनाओं की लूट और व्यवस्थागत लचर स्थिति का प्रदर्शन, जमा खोरी, मुनाफा खोरी मिलावट और प्रायोजित महमाई स्थायी रूप से धावा बोल चुकी है इसमें शोध भी चलता रहता है कि और कुछ जुड़ सके तो जुड़े घंटे नहीं उसका ख्याल जरूर रह समाज सुधार व्यवस्था में सुधार की बाते उठती है। जनतंत्र का जो जो इलाज और उसकी दवा है, चलाई जाती है मिडिण वाले छापकर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करते है हम सभी सामाचार पढ़कर विविध रूपों में संवदित हो लेते है।

काले धन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना कहे या आर्थिक समाजवादी परिवर्तन किन्तु उसके नये नमूने भी आये सुधार के पूर्व ही छपने वाले जाली नये नोट सामने आकर आश्चर्म चकित कर डाला। कल ही का तो समाचार है आप सभी पढ़ें सुने होंगे कि हरियाणा के दो युवा अच्छे हैसियत और योग्यता वाल ने दो करोड़ जाली नोट स्वयं छापकर जनता में चालू कर दिया और रंगे हाथ पकड़े भी गये आज तक बड़े-बड़े घोटाले में पकड़े गये तो बहुतों बार आपने सुना होगा किन्तु निर्णय आप ही पर छोड़ता हूँ बताइये इससे आगे क्या सुधार हुआ देश का क्या दिशा मिली। आपको और देश दुनियाँ को क्या संदेश गया आप (देश) राष्ट्रीय गान गाते रहें आप (नेतागण ) अपनी सभा में राष्ट्रगान सुनत और सुनाते रहे। राष्ट्र भक्त सघमार कर चले गये। मैं समझता हूँ कि आप में सत्ता चलाने की अपूर्व क्षमता है आपके पास बुद्धिमान, योग्य, प्रशिक्षित, अनुभवी प्रहरी की जमात है। वेतन पाते है सेवा सुरक्षा में पीछे क्यों पढ़ते है। उपद्रवी या साजिस कर्ता कैसे सफल हो जाते है। आप उन्हें पद से क्यों न हटाते उन विभागों को समाप्त क्यों न करते उनका वेतन उनकी सेवाके पुरस्कार है या चोर को सफलता दिलाने का ?

नोट बन्दी का सैद्धांतिक लाभ सबने स्वीकारा समर्थन किया उसके भविष्य का उज्जवल पक्ष देखने की आशा में आंखें गडी हुयी है तबतक इसके कटु अनुभव सामन आ रहे है अदूरदर्शिता बताई जा रही है मूले स्वीकारी जा रही है समस्या को मोदी जी के ही शब्दों में कुछ नेताओं द्वारा कडक प्रदान किया जा रहा है कई अनियमितताएं भ्रष्ट अजान और अन्दाज सामने आ रहे है सतर्कता भी है और चिन्ता भी, नयी-नयी नीतियों पर विचार चल रहा है। देश का चरित्र नहीं सुधारा गया सभी काबिल है ससद में कौन रहते है ? संसद क्यों नहीं चलने दिया जा रहा उसी के राष्ट्रीय एकता और अखंडता कहते है। अथवा रोटी कपड़ा और मकान पर खतरा मंडरा रहा है। पाँच ही वर्षो की बात है। उधर सीमा पर संघर्ष चल रहा है। मात्र 2.5 वर्ष शेष ? परम्परा बन गयी हैं और विकल्प खुला हुआ है। क्या मजाक है अच्छे दिनों की तलाश।

रोटी कपड़ा और मकान तो हमारी मौलिक आवश्यकता है उससे भी ऊपर उठकर हमें सामाजिक सरोकारो को सुदृढ़ दिशा देनी है।

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