Sat. Feb 4th, 2023

विकास की पृष्ठभूमि मे
 कल्याणकारी भूमिका

 मानवी सृष्टि मे सभ्यता का विकास उसकी चेतना सत्ता की पहचान है | इसने एक संस्कृति का निर्माण किया जो इसे स्वावलंबी और सुखी जीवन – यापन की कला दी । किंतु इस संस्कृति के सन्चय की सूझ उसे चंचल बनाकर चेतना में मोड़ लाई | फिर सन्चय में सुरक्षा और धन की ममता से स्वत्व की भावना उसके हृदय में घुसी | वही से वह स्वार्थी बन गया | प्रबुद्ध चेतना में कल्याण की कामना से मानवता का सृजन और सम्वरम उसका भूषण बना | तब मानव में देवत्व की झलक आई । विकास का श्रेय निर्माण की कामना को मिलनी चाहिए वहाँ वह भोग भावना में लिप्त हुआ तो विकास लक्ष्य कुंठित होना ही है | वैसे में घटते धन , मान – सम्मान में ह्रास से ग्लानि हासिल होना स्वाभाविक है | भोगोन्मुख प्रवृत्ति का झुकाव आर्थिक प्रतिस्पर्धा पाकर चंचल बनाएगा तो पाप में प्रवृत्ति होनी है | यह प्रक्रम सृष्टि में अबतक दुहराता गहराता गया | यही इतिहास जीवन का दास्तान है । दुनिया पाप और पुण्य का बाजार बना | यहाँ चतुर दुकानदार और मूर्ख ग्राहक मिलते हैं | इसीका लाभ दुनिया को लुभा रही है । आज भ्रष्टाचार सर्वत्र सिर खड़ा कर घूम रहा है | उसपर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा | राक्षसी आतंक फैला हआ है । दुनिया का शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका आज चिंता में डूबा है | यह विडंबना है की विश्व कैसे स्वीकार कर लिया की मेडिकली एवं प्रेवेंटिव रूप में कन्वेंशनल सिस्टम ही कारगर हो सकता है । वैकल्पिक सेवा पर ही काम चलाया जा रहा है , तो इस विश्वव्यापी कोरोना से यह युद्ध कैसे जीता जाएगा जब यह रोग है और चिकित्सा उसके सामने आज घुटने टेक गया । विश्व की संस्कृति भारत का लोहा माना , ऐसा हम सब सुनते रहे | आज समय आया तो कहीं कुछ पाया नहीं जा रहा | खेद है – मेधा क्यों मंद हुई ? मूक क्यों बैठा रहा | इसका नेतृत्व कहाँ गया | सब लॉक – डाउन ! . . . . . . . . . फिर लॉकडाउन पर शिकंजा और कसा जा रहा । कोरोना मान नहीं रहा | दुनिया में जहाँ भारतीय है बिहारी है , संक्रमित हो चुके हैं अथवा नहीं भी लेकिन वहाँ से उनका पलायन हो रहा है | विश्व में उन्हें शरण नहीं | अपनी सीमा पर आकर वे कष्ट तो पा ही रहे हैं उन्हीं के संक्रमण की मार भारतवासी सहन कर रहे हैं । यह कैसा विधान है । हम क्या सोच रहे हैं ।
हम क्यों न अपने आप में स्वस्थ चिंतन लाएँ ? वेदवाणी है की स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मानस विकास पाता है । हम गंगा में गंदगी झाँक रहे हैं । पृथ्वी पर प्रदूषण पा रहे हैं विचार में भ्रांति पाल रखे हैं | जब बाहर से कुछ हाथ लगने वाला नहीं तो अच्छा है यह लॉक – डाउन | पूरा अवकाश का लाभ लें , मान को शांत और संतुष्ट बनाए रखें | स्वस्थ चिंतन , भगवद्भजन , चरणवंदन करें | व्यस्त जीवन के भाग – दौड़ से दूर रहकर , अबतक जिन सुअवसरों का लाभ न ले सके उसका रसास्वादन कर आत्मा को तृप्त करें । दवासेवन , आराम , स्वाध्याय , मंत्रजाप , उपासना , मौन , स्वल्यहार , रस सेवन , का आनंद लें । दान , अनुष्ठान , आह्वान कर कोरोना के प्रयास की कामना करें । मैं कल एक एप्रिल को मौन रखूगा | दो एप्रिल को रामनवमी को राम जन्मभूमि पर राम मंदिर की नींव स्थापित होने वाली है , मेरी हार्दिक कामना होगी , पूरे भारतवासियों की ओर से की कोरोना का क्रंदन भारतभूमि सहित हिंद महासागर और नाभमंडल से विदा लेकर इस देवभूमि , वेदभूमि को निसंक्रमित छोड़ प्रयास करे | जब रामचंद्र जी रावन को मोक्ष प्रदान कर अयोध्या लौटे तो उनके राज्य में सत्य , शौच , दया और दान जैसे धर्म के विधान उन दयानिधान के होते न कभी घटा और न कोई कष्ट वहाँ के नर – नारियों में पाया गया | रामराज्य का स्वरूप राममय ही रहा | उसी प्रकार विकास की पृष्ठभूमि में कल्याण की ही भूमिका लक्षित होनी चाहिए जो आज नहीं देखा जा रहा तो विश्व वेदना का शिकार होगा ही मानव से सदभावना समाप्त है | जीवन में शुचिता और सदभावना ही सुयश दिलाने वाली है । आप चाहे तो जबतक यह लॉक – डाउन प्रभावी है , रामायण ( रामचरितमानस ) का नवाहन पारायण कर सकते हैं | जीवन में ऐसा अवसर न मिलने वाला है | रामकथा का वाचन और श्रवण सभी प्रकार से कल्यानप्रद है | 

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